पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट वंश

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750-1000 ईस्वी के मध्य उत्तर भारत और डेक्कन में कई शक्तिशाली साम्राज्य पैदा हुए। जिनमें पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट सबसे महत्वपूर्ण थे।

पाल:

पाल राजवंश की स्थापना 750 ईस्वी में गोपाल द्वारा की गयी थी जो पहले एक मुखिया था लेकिन बाद में बंगाल का राजा बन गया था। वास्तव में वह बंगाल का पहला बौद्ध राजा था। गौ़ड राजवंश को उनके गढ़ कामरूप में शिकस्त देने के बाद उसने अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। जब उसकी मृत्यु हुयी थी तब बंगाल और बिहार के अधिकांश हिस्से उसके नियंत्रण में थे। बिहार के ओदंतपुरी में एक मठ के निर्माण का श्रेय गोपाल को जाता है।

गोपाल का उत्तराधिकारी धर्मपाल बना था। उसने 770-810 ईस्वी की अवधि के दौरान शासन किया था। उसके शासनकाल के दौरान पाल साम्राज्य उत्तर और पूर्वी भारत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था।

उसने गुर्जर प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के खिलाफ एक लंबे समय तक युद्ध लड़ा। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय के खिलाफ अपनी शर्मनाक हार के बावजूद वह पाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब रहा और अपने साम्राज्य को पूरे बंगाल तथा बिहार तक विस्तारित किया।

एक प्रसिद्ध बौद्ध राजा धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की जो भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन का एक प्रसिद्ध केंद्र था। यह विश्वविद्यालय बिहार में भागलपुर के कहलगांव में स्थित है।

धर्मपाल का उत्तराधिकारी देवपाल बना था। उसने अपने साम्राज्य को असम, ओडिशा और कामरूप तक विस्तारित किया। उसके शासनकाल के दौरान पाल सेनाओं ने एक बहुत ही सफल अभियान को अंजाम दिया था।

देवपाल के बाद ऐसे राजा सिंहासन पर विराजमान हुए जो बहुत ही कम जाने जाने थे। तत्पश्चात महिपाल पाल साम्राज्य का राजा बन गया था। उसने 995 ईसवी से 1043 ईसवी तक शासन किया था। उसे पाल राजवंश के दूसरे संस्थापक के रूप में जाना जाता है, उसने पाल साम्राज्य के सभी खोए हुए प्रदेशों को फिर से हासिल कर लिया था।

महिपाल के उत्तराधिकारी कमजोर थे और साम्राज्य पर अपनी पकड़ बरकरार नहीं रख सके थे।

प्रतिहार

गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना 6 वीं शताब्दी ईस्वी में हरीचंद्र द्वारा की गयी थी। वे 11 वीं सदी तक प्रभावशाली बने रहे थे। यह कहा जाता है कि उनका उदय उज्जैन या मंदसौर से हुआ था। नागभट्ट- प्रथम इस वंश का पहला महत्वपूर्ण शासक था। उसने 730 ईसवी से 756 ईसवी तक शासन किया था। उनके साम्राज्य में ग्वालियर, भरूच और मालवा शामिल था। उसके साम्राज्य की राजधानी अवनि थी।

नागभट्ट प्रथम की उपलब्धि: उसने जुनैद, अरब कमांडर और उसके उत्तराधिकारी तमिन को राजस्थान के युद्ध में पराजित कर दिया था। इससे उसने सफलतापूर्वक अरब आक्रमण के खिलाफ पश्चिमी सीमाओं का बचाव किया था।

वत्सराज एक नये राजा के रूप में नागभट्ट प्रथम का उत्तराधिकारी बना और पाल राजा धर्मपाल को हराकर उसने कन्नौज पर अधिकार स्थापित कर लिया था।

नागभट्ट द्वितीय 805 ईस्वी के आसपास वत्सराज का उत्तराधिकारी बना था। वास्तव में, वह गुर्जर प्रतिहार राजवंश का सबसे प्रख्यात राजा था। उसे, विशेषकर 815 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जाना जाता है। मंदिर को 725 ईस्वी में जूनायड की अरब सेनाओं ने नष्ट कर दिया गया था।

मिहिरभोज इस वंश का अन्य मुख्य राजा था। उसका शासनकाल 885 ईस्वी तक चला था। वह एक महान साम्राज्य निर्माता था। उसने युद्धों की एक श्रृखंलाओं में विजय प्राप्त करने के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के प्रदेशों पर कब्जा कर लिया था। उसने अधिवर्हा का खिताब प्राप्त किया था और ग्वालियर में तेली मंदिर का निर्माण किया था।

हालांकि, 10 वीं सदी में गुर्जर प्रतिहारों की शक्ति में कमी आयी थी और उनके राजा भोज द्वितीय को पाल राजा महिपाल-प्रथम द्वारा शिकस्त का सामना करना पडा था। जल्द ही साम्राज्य विघटित हो गया और सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट कन्नड़ मूल के थे और उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 8 वीं सदी में दन्तिदुर्ग द्वारा की गयी थी। उसने डेक्कन में राष्ट्रकूटों को एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसने गुर्जरों को हराने के बाद मालवा पर आधिपत्य कर लिया था। उसने कीर्तिवर्मन द्वितीय को भी पराजित कर चालुक्य राज्य पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था।

उसका उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम था जो एक महान साम्राज्य निर्माता था। कृष्ण प्रथम ने वेंगी के पूर्वी चालुक्यों और गंगों के खिलाफ विजय प्राप्त की थी। उसे एलोरा की चट्टानों को काटकर विशालकाय कैलाश मंदिर के निर्माण के लिए जाना जाता है। उसका उत्ताराधिकारी गोविंदा तृतीय रहा था।

अमोघवर्ष प्रथम (815-880 ईस्वी) गोविंदा तृतीय का उत्तराधिकारी बना जिसका शासनकाल अपने सांस्कृतिक विकास के लिए लोकप्रिय था। उसने जैन धर्म का पालन किया। वह कन्नड़ भाषा लिखित एक प्रसिद्ध पुस्तक कविराजमार्ग का भी लेखक था। वह राष्ट्रकूट राजधानी मलखेड या मन्याखेड़ का भी वास्तुकार था।

अमोघवर्ष प्रथम का उत्तराधिकारी कृष्ण तृतीय (936-968 ईस्वी) बना था। जिसे पड़ोसी राज्यों के खिलाफ अपने विजयी अभियान के लिए जाना जाता था। उसने तक्कोतम में चोलों के खिलाफ विजय प्राप्त की थी।

उसने तंजौर के साथ-साथ रामेश्वरम पर भी कब्जा कर लिया था। अमोघवर्ष ने कई मंदिरों का भी निर्माण करवाया था जिनमें रामेश्वरम का कृष्णस्वारा मंदिर भी शामिल था।

उसकी मृत्यु के बाद राष्ट्रकूटों की शक्ति में कमी आई थी।

राजपूत वंश के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक विकास

राजपूत आक्रामक और बहादुर लड़ाके थे, जिसे वे अपने धर्म के रूप मे मानते थे। उन्होने गुणों और आदर्शो को महत्व दिया जो बहुत उच्च मूल सिद्धान्त थे। वे बड़े दिल वाले और उदार थे, वे अपने मूल और वंश पर गर्व अनुभव करते जो उनके लिए सर्वोच्च था। वे बहादुर, अहंकारी और बहुत ही ईमानदार कुल के थे जिन्होने शरणार्थियों और अपने दुश्मनों को पनाह भी दी थी।

लोगो के सामाजिक और सामान्य शर्ते:

युद्ध विजय अभियान और जीत राजपूत समाज और संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता थी।
समाज बुरी तरह परेशान था क्यूंकि लोगो के रहन सहन के स्तर मे काफी असमानता थी। वे जाति और धर्म प्रणालियों मे विश्वास रखते थे।
मंत्री, अधिकारी, सामंत प्रमुख उच्च वर्ग के थे, इसलिए उन्होने धन जमा करने के विशेषाधिकार का लाभ उठाया और वे विलासिता और वैभव मे जीने के आदी थे ।
वे कीमती कपड़ो, आभूषणों और सोने व चांदी के जेवरों मे लिप्त थे। वे कई मंजिलों वाले घर जैसे महलों मे रहा करते थे।
राजपूतों ने अपना गौरव अपने हरम और उनके अधीन कार्य करने वाले नौकरो की संख्या मे दिखाया।
दूसरी तरफ किसान भू-राजस्व और अन्य करों के बोझ तले दब रहे थे जो सामंती मालिको के द्वरा निर्दयतापूर्वक वसूले जाते थे या उनसे बेगार मजदूरी करवाते थे।
जाति प्रथा:

निचली जातियों को सीमान्ती मालिकों की दुश्मनी का सामना करना पड़ा जो उन्हे हेय दृष्टि से देखते थे।
अधिकांश काम करने वाले जैसे बुनकर, मछुवारे, नाई इत्यादि साथ ही आदिवासियों के साथ उनके मालिक बहुत ही निर्दयी बर्ताव करते थे।
नई जाति के रूप मे ‘राजपूत’ छवि निर्माण मे अत्यंत लिप्त थे और सबसे अहंकारी थे जिसने जाति प्रथा को और अधिक मजबूत बना दिया था।
महिलाओं की स्थिति:

यद्यपि महिलाओं का सम्मान अत्यधिक स्पष्ट था और जहा तक राजपूतो के गौरव की बात थी तो वो अभी भी एक अप्रामाणिक और विकलांग समाज मे रहते थे।

निम्न वर्ग की राजपूत महिलाओं को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था। हालांकि, उच्च घरानो के परिवारों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। महिलाओं के लिए कानून बहुत कटीले थे।
उन्हे अपने पुरुषो और समाज के अनुसार उच्च आदर्शो का पालन करना पड़ता था। उन्हे अपने मृतक पतियों के शव के साथ खुशी से अपने आप को बलिदान करना पड़ता था।
यद्यपि कोई पर्दा प्रथा नहीं थी। और ‘स्वयंवर’ जैसी शादियों का प्रचलन कई शाही परिवारों मे था, अभी भी समाज मे भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं देखने को मिलती थी।
शिक्षा और विज्ञान:

राजपूत शासन काल मे केवल ब्राह्मणो और उच्च जाति के कुछ वर्गो को शिक्षित होने / शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था।

उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध केंद्र बिहार के नालंदा मे था और कुछ अन्य महत्वपूर्ण केंद्र विक्रमशिला और उदन्दापुर मे थे। इस समय केवल कुछ ही शिक्षा के शैव केंद्र कश्मीर मे विकसित हुये।
धर्म और दर्शन अध्ययन चर्चा के लिए लोकप्रिय विषय थे।
इस समय तक भी विज्ञान के ज्ञान का विकास धीमा / शिथिल था, समाज तेजी से कठोर बन गया था, सोच परंपरागत दर्शन तक ही सीमित थी, इस समय के दौरान भी विज्ञान को विकसित करने का उचित गुंजाइश या अवसर नही मिला।
वास्तुकला:

राजपूत काफी महान निर्माणकर्ता थे जिनहोने अपना उदार धन और शौर्य दिखाने के लिए किलों, महलो और मंदिरो के निर्माण मे अत्यधिक धन खर्च किया। इस अवधि मे मंदिर निर्माण का कार्य अपने चरम पर पहुँच गया था।
कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों मे पुरी का लिंगराज मंदिर, जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क मे सूर्य मंदिर है।
खजुराहो, पुरी और माउंट आबू राजपूतों द्वारा बनवाए गए सबसे प्रसिद्ध मंदिर माने जाते है।
राजपूत सिचाई के लिए नहरों, बाधों, और जलाशयो के निर्माण के लिए भी जाने जाते थे जो अभी भी अपने परिशुद्धता और उच्च गुणवत्ता के लिए माने जाते है।
कई शहरो जैसे जयपुर, जोधपुर, जैसलमर, बीकानेर, के नींव की स्थापना राजपूतों के द्वारा की गई थी, इन शह रों को सुंदर महलों और किलों के द्वारा सजाया गया था जो आज विरासत के शहर के नाम से जाना जाता है।
अट्ठारहवीं शताब्दी मे सवाई जयसिंह के द्वारा बनवाए गए चित्तौड़ के किले मे विजय स्तम्भ, उदयपुर का लेक पैलेस, हवा महल और खगोलीय वेधशाला राजपूत वास्तुकला के कुछ आश्चर्यजनक उदाहरण है।
चित्रकारी/चित्रकला:

राजपूतो के कलाकृतियों को दो विद्यालयों के क्रम मे रखा जा सकता है- चित्रकला के राजस्थानी और पहाड़ी विद्यालय।
कलाकृतियों के विषय भक्ति धर्म से अत्यधिक प्रभावित थे और अधिकांश चित्र रामायण, महाभारत और राधा और कृष्ण के अलग-अलग स्वभावों को चित्रित करता था।
दोनों विद्यालयों की प्रणाली समान है और दोनों ने ही व्यक्तियों के मौलिक जीवन के दृश्यों की व्याख्या करने के लिए प्रतिभाशाली रंगो का उचित प्रयोग किया।

विजयनगर साम्राज्य के सम्राट या शासक

साम्राज्य के इतिहास, विकास, वास्तु कृतियों और नवाचारों के बारे में अधिकांश जानकारी विदेशी यात्रियों के माध्यम से मिलती है। विजयनगर साम्राज्य की उत्पत्ति का वर्णन इतिहास के विभिन्न संस्करणों में किया गया है, कई इतिहासकारों का मत है कि विजयनगर साम्राज्य की स्थापना बुक्का राय प्रथम द्वारा की गयी थी जो कन्नड़ (होयसाल साम्राज्य के सेना कमांडर) थे जबकि अन्य का मानना है कि ये शासक तेलगू मूल के थे जिनका काकतीय साम्राज्य (अपने पतन के आसपास होयसाल साम्राज्य के उत्तरी भाग के नियंत्रक) के साथ संपर्क रहा था।

हालांकि इतिहासकारों का एकमत से मानना है कि दक्षिणी भारत में मुस्लिम प्रभाव से लड़ने के मकसद के साथ साम्राज्य के संस्थापको को एक श्रृंगेरी संत विद्यारण्य का समर्थन प्राप्त था क्योंकि ये मुस्लिम बार-बार दक्कन के हिंदू राज्यों पर हमला कर वहां के शासकों को पराजित कर रहे थे। मुस्लिम राज में केवल एक ही साम्राज्य “होसयाल” शेष रह गया था। होयसाल साम्राज्य के राजा की मौत के बाद इसका विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया था जो 14 वीं शताब्दी से पहले एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था।

हरिहर प्रथम को पूर्व पश्चिम समुद्रधीश्वर (पूर्वी और पश्चिमी समुद्र का प्रमुख) के रूप में जाना जाता था जिसने साम्राज्य की मजबूत नींव रखी थी और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में चारों ओर प्रमुख क्षेत्रों पर अपना शासन मजबूत कर लिया था। बुक्का राय प्रथम ने आर्कोट, कोडावीडु के रेड्डी बंधु, मदुरै के सुल्तान प्रमुखों को हराकर न केवल अपने साम्राज्य का पश्चिम में बल्कि तुंगभंद्रा- कृष्णा नदी के उत्तर तक विस्तार किया तथा उसका उत्तराधिकारी बना। अनेगोंडी (वर्तमान में कर्नाटक) में साम्राज्य की राजधानी स्थापित की गयी जिसे बाद में विजयनगर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से साम्राज्य को इसका नाम प्राप्त हुआ था।

अपनी राजसी क्षमता के साथ साम्राज्य प्रमुख रूप से दक्षिणी भारत तक फैल गया था जिसका उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय (बुक्का राय प्रथम का दूसरा पुत्र) था जिसने आगे चलकर अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का पूरे दक्षिण क्षेत्र में विस्तार किया। इसके बाद साम्राज्य को देव राय प्रथम द्वारा संघटित किया गया जिसने ओड़िशा के गजपतियों को परास्त किया और साम्राज्य की सिंचाई और दुर्ग निर्माण के प्रमुख कार्यों को क्रियान्वायित किया। तत्पश्चात देव राय द्वितीय गद्दी पर आसीन हुआ जिसे संगम राजवंश का सबसे शक्तिशाली और सफल शासक के रूप में जाना जाता है। सामंती शासन की वजह आंतरिक अस्थिरता की लड़ाई रही थी। उसने श्रीलंका द्वीप पर भी आक्रमण किया और बर्मा साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

15 वीं शताब्दी के आसपास साम्राज्य में गिरावट तब तक दर्ज की गयी जब तक कंमाडर सलुवा नरसिंह देव राय और जनरल तुलुव नरस नायक नें क्रमश: 1485 और 1491 में साम्राज्य की ताकत मजबूत करने के ज्यादा प्रयास नहीं किये थे । अंत में साम्राज्य की बागडोर कृष्ण देव राय (तुलुव नरस नायक का पुत्र) के हाथों में आ गयी जिसने विद्रोही सरदारों से युद्ध किया और डेक्कन सल्तनत आक्रमणकारियों को हराकर साम्राज्य को मजबूती प्रदान की। कृष्णदेव राय के शासन में साम्राज्य अपने शिखर पर पहुंच गया था और उसने दक्षिण में अपने सभी अधीनस्थों पर सफल नियंत्रण बनाए रखा था। अपने शासन के दौरान उसने कई स्थापत्य स्मारकों के निर्माण निर्दिष्ट कर कई निर्माण कार्य पूरे भी किये थे।

अच्युत देव राय (कृष्णदेव राय का छोटे भाई) उसका उत्तराधिकारी बना और बाद में उसकी जगह 1529 में सदाशिव राय ने ली थी जबकि वास्तविक शक्ति आलिया राम राय (कृष्णदेव राय का दामाद) के हाथों में निहित थी जिसने अंततः धोखाधड़ी और फूट का फायदा उठाकर शक्ति अपने हाथों में ले ली थी और उत्तर में राजनैतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए उसने बीजापुर, बरार, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर की सल्तनत के बीच अशांति पैदा कर दी। कुछ सल्तनतों ने उत्तर में उसके खिलाफ एक गठबंधन का गठन कर दिया और जनवरी 1565 में विजयनगर की सेनाओं के खिलाफ भिड़ गये। विजयनगर विजयी होकर उभरा जबकि आलिया राम राय को कैद कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे विजयनगर साम्राज्य में साधारण सैनिकों के ऊपर अशांति और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी और सल्तनतों ने उन खंडहरों में अपनी सेना में कटौती कर दी जिसे वह कभी हासिल नहीं कर सके थे। विजयनगर में एकमात्र जीवित कंमाडर तिरुमाला देव राय (राम राय का छोटा भाई) ने एक विशाल खजाने की राशि के साथ साम्राज्य छोड़ दिया।

साम्राज्य में धीरे धीरे गिरावट आने लगी थी जबकि पुर्तगालीयों के साथ व्यापार जारी था और अंग्रजों को मद्रास की स्थापना के लिए एक जमीन आवंटित कर दी गयी थी। श्रीरंग प्रथम (तिरुमाला देव राय का पुत्र) और वेंकट द्वितीय विजयनगर साम्राज्य के अंतिम शासक थे। साम्राज्य शासन के उत्तराधिकारी राम देव राय और वेंकट तृतीय द्वारा एक दशक के लिए विस्तारित कर दिया गया था जिसके बाद साम्राज्य बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनत के हाथों में आ गया। विजयनगर साम्राज्य के सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और इसका असर 18 वीं सदी तक दक्षिण भारत के इतिहास पर पड़ा। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद 1799 में मैसूर राज्य ब्रिटिश राज के अधीन आ गया था लेकिन भारत की आजादी तक यह एक राजसी राज्य बना रहा था।

मीरा बाई (1498 ईश्वी-1550 ईश्वी)

16वीं शताब्दी ने मीरा बाई के रूप में भगवान कृष्ण की एक आसाधारण भक्त और एक रहस्यवादी कवियत्री देखी | प्रामाणिक दस्तावेज़ों की कमी के कारण, उसकी जीवनी के बारे में दूसरे साहित्यों से पता लगाया गया है जिसमे उसके जीवन के बारे में बताया गया है |

सन 1498 में शाही परिवार में राजस्थान के मेड़ता के चौकरी गाँव में जन्म हुआ | मीरा ने संगीत, राजनीति, धर्म और शासन में शिक्षा प्राप्त की थी | विष्णु भक्त के अनुयायियों के परिवार में पली बड़ी मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोज राज से 1516 AD में विवाह किया | युद्ध में लगी चोटों के कारण अपने पति को खोने के बाद, मीरा का भगवान कृष्ण ( जिनको उन्होनें बचपन से ही अपने प्रेमी/पति के रूप मे मान लिया था ) की सामाजिक सम्मेलनों में निर्भयता और अनुकरणीय धार्मिक भक्ति करने के कारण उपेक्षा की गई और उसके ससुराल वालों द्वारा कई बार उनका उत्पीड़न करने का प्रयास किया गया , लेकिन हर बार वह किसी तरह से चमत्कारिक ढंग से बच गई | कई किंवदंतियों तथा लोककथाओं के विवरण में इस तरह की घटनाओं का उल्लेख किया गया है | हालांकि इतिहास के पुनर्लेखन के अटकलों के बावजूद कहानियों मे कुछ विसंगताएं इतिहासकारों के लिए राजनीतिक लाभ का कारण बनी |

उत्तर हिन्दू परंपरा की एक प्रसिद्ध कवियत्री, मीराबाई, भक्ति आंदोलन की संस्कृति का एक सम्मानित नाम था | भगवान कृष्ण की स्तुति में पूरी भावना के साथ गायी गई कई कविताओं का श्रेय मीरा बाई को जाता है जिसमें उनके अमर स्नेह और पवित्र प्रतिबिंब को दर्शाया है, उनके भजनों की भारत भर में प्रशंसा की गई है जिसकी प्रामाणिकता की जांच कई विद्वानों द्वारा की गई है |

कृष्ण की भक्ति में अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाली मीरा ने कृष्ण को योगी व प्रेमी की तरह दर्शाया है और उनकी कविताओं मे मीरा का कृष्ण की योगिनी बनने और उनसे आध्यात्मिक शादी के बंधन में बंध कर उसकी उत्कंठा और प्रत्याशा के बारे में बताया गया है |

मीरा की कविताएं जिसमे छंद है उन्हे “पद” कहा गया है | लोककथाएँ में वर्णित है कि किस तरह मीरा परम आनंद में नाचती हुई कृष्ण की भक्ति में खुद को डुबाते हुए दूसरे ही मोहावस्था में प्रवेश करती हैं और वह सभी वर्ग के भक्तों को आकर्षित करती थी | इनकी कविताओं के संस्करन वर्तमान समय में पुस्तकों, नाटकों, चित्रों आदि में पाये जाते हैं | चित्तोडगढ़ किले की तरह कुछ हिन्दू मंदिर भी इनको समर्पित किए गए हैं |

हालांकि उनके काम की विश्वसनीयता और उससे संबन्धित कहानियाँ के बारे में पर्याप्त सबूतों के लिए छानबीन की गई है, किंवदंतियों के अनुसार, मीरा बाई ने मेवाड़ के राज्य को छोड़ दिया था और फिर कभी शाही जीवन की विलासिता की ओर आकर्षित नहीं हुईं | वह तीर्थ पर चली गईं और वृंदावन, द्वारका में रहते हुए उन्होनें अपना पूरा ध्यान कृष्ण की भक्ति की तरफ लगा दिया, जहां उनकी भक्ति का कोई विरोधी नहीं था और ना ही उन्हे किसी भी तरह की असहमति का सामना करना पड़ता था |

यह माना जाता है कि मीरा उत्तर भक्ति संतों के विश्वास का प्रतिनिधित्व करती है जो निराकार ब्रह्मा की वकालत करते हैं | उनके भक्ति गीतों ने भक्ति आंदोलन के साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है | कृष्ण भक्ति में उसकी व्यक्तिगत ओर पवित्र रूप के बारे में बात करें तो मीरा की कवितायें हिंदु देवता कृष्ण में पूर्ण समर्पण और विश्वास को दर्शाती है |

विद्वानों का तर्क है कि 16वीं सदी के सामाजिक चरण में हिन्दू मुसलमान के संघर्ष के मध्य में मीरा लोगों के कष्ट के विकल्प के प्रतिबिंब के रूप में उभरी | और उसकी ईमानदारी और द्र्ढ़ विश्वास के प्रभाव ने उस समय के उद्दंड सामंतों के साथ रिश्तों को भी बदल दिया |

लोगों के अनुसार, 1547 मे वह चमत्कारिक ढंग से मीरा कृष्ण की मूर्ति में समा गईं, हालांकि इस बात के कोई भी सबूत नहीं हैं, मीरा ने उस समय के धार्मिक जोश को बढा दिया और उनके समर्पण ने साहित्य में बहुत बड़ा योगदान दिया है जिसमे उनका अनंत प्रेम और विश्वास दिखता है |

सभी विपक्षियों और उनके उत्पीड़नों के प्रयासों के बावजूद,उसकी श्रद्धा और निष्ठुर भक्ति के लिए स्वतन्त्रता का संदेश उसके द्र्ढ संकल्प के प्रभाव को दिखती है | उसकी कवितायें अपने अधिकारों के लिए खड़े होना और अभियुक्तों को दोषी करार कर पकड़ने तथा मानव और परमात्मा के बीच मौजूद प्यार के प्रतिबिंब को दर्शाती है |

कबीर

15वीं सदी ने कबीर के रूप में एक ऐसे रहस्यवादी सूफी कवि व संत को देखा जिसने धर्म, समाज और राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर प्रभाव डाला जिसका असर आज तक दिखाई देता है |

माना जाता है कि उनका जन्म बुनकर परिवार में हुआ, उनके जन्म के बारे में भिन्न-भिन्न जानकारियों की वजह से हिन्दू और मुसलमानों के बीच अक्सर उनकी पहचान को लेकर विभिन्न विचार रखे गए हैं | भारत में सबसे प्रसिद्ध कवि और सबसे उद्ध्त लेखक, कबीर ने अपने जीवन काल में 1498-1518 AD के दौरान प्रभावशाली कवितायें बनाईं जिसका प्रभाव भक्ति आंदोलन पर पड़ा और उनके छंदों का उल्लेख सिख धर्म के आदि ग्रंथ में भी संग्रहीत हैं |

कबीर, भक्ति काल के कवि व संत स्वामी रामानन्द (एक ऐसा व्यक्ति जिसका लक्ष्य इस्लाम, ईसाई धर्म और ब्राह्मण के सिद्धांतों को मिश्रित करना था ) के शिष्य बन गए अतः कबीर की कविताएं उनके गुरु के विचारों के विलय का एक प्रतिबिंब है और शैली में काल्पनिक स्थानीय भाषा की मान्यता को दर्शाता है | शैली में स्थानीय भाषा का प्रयोग किया गया है , जीवन की विशेषताओं व ईश्वर के प्रति श्रद्धा पर केन्द्रित कविताओं में हिन्दी, अवधि, ब्रज, और भोजपुरी बोलियों का प्रयोग किया गया है

कबीर की कविताओं में उस समय की सामुदायिक गतिशीलता और तर्कसंगत सोच को अभिव्यक्त किया गया है | जीवन के प्रति उसके दार्शनिक आकलन ने आज की पीढ़ी को उदार विचारों की पहुँच दी है | उनका संश्लेषण दोनों संस्कृतियाँ हिन्दू धर्म और इस्लाम व सिख धर्म सहित का मुख्य स्त्रोत बना है | हिन्दू व इस्लाम धर्म और उनकी अर्थहीन परम्पराओं रीति-रिवाजों आलोचना करने के लिए उन्हे जाना जाता है, वह दावा करते हैं कि दोनों धर्मों ने क्रमशः वेद और कुरान की गलत व्याखाया की है और जीवन के सार को नज़रअंदाज़ कर दिया है | उन्होने सुझाव दिया है कि जीने का सही तरीका धर्म के मार्ग के माध्यम से है, सभी लोग ईश्वर के प्रतिबिंब हैं और अतः सब बराबर हैं, उन्होनें ईश्वर को समझने और चिंतन करने के लिए राम-राम के मंत्र का प्रचार किया | दोनों धर्मों(हिन्दू व इस्लाम ) का गंभीरता से आकलन करते हुए कबीर अपने विचारों के लिए लड़े हालांकि उन्हे दोनों संप्रदायों के द्वारा धमकाया गया, उन्होनें इसका स्वागत किया व उन्हे ईश्वर के ओर नजदीक ले जाने के लिए आभार प्रकट किया |

कबीर ने बुनियादी धार्मिक सिद्धांतों में जीवात्मा और परमात्मा को संघटित किया और इनकी राय के अनुसार इन दोनों की एकता के साथ ही मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है | कबीर द्वारा रचित, ज्ञान की मौखिक कविताओं को उनके अनुयायियों द्वारा “वाणी” कहा गया जिसमे दोहे, श्लोक थे और इन्हें वास्तविकता का सबूत माना जाता था | कबीर की विरासत को कबीरपंथ के माध्यम से जीवित रखा गया जिसे धार्मिक संप्रदायों और इनके सदस्यों द्वारा पहचान मिली जिन्हें कबीरपंथी कहा जाता है |

इनकी साहित्यिक कृतियाँ इस प्रकार हैं कबीर बीजक, कबीर परछाई, आदि ग्रंथ, आदि ग्रंथ और कबीर ग्रंथावली |

शाश्वत रूप से उनके काम में अभिव्यक्ति और रहस्यमय भावना और व्यापक मान्यताओं के रूपकों के साथ धर्मों के प्रतीक की सहजता है |हालांकि, कबीर की उनके दोहों में महिलाओं के प्रति ब्यान के लिए आलोचना की गई थी | यह तर्क दिया गया है कि कबीर की कविताओं में दोहरी व्याखाया है और इसलिए इनमे अंतर हो सकता है |

कबीर ने अपने जीवन काल का ज़्यादातर समय वाराणसी में बिताया और ये बताया गया है कि वाराणसी विशाल हिन्दू पुजारियों के प्रभाव का केंद्र था, उनके द्वारा पारंपरिक प्रथाओं को कम आँकने के लिए उनकी बहुत आलोचना की गई | उन्हे 1495 AD में लगभग 60 वर्ष की उम्र में वाराणसी से बाहर निकाल दिया गया, उसके बाद वह अपने अनुयायियों के साथ उत्तरी भारत की तरफ चले गए और निर्वासन का जीवन व्यतीत किया | प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्होनें 1518 AD में आखिरी सांस गोरखपुर के नजदीक मगहर में ली |

उनके जन्म की तरह ही उनकी मृत्यु भी अनेक विवादों से घिरी रही, जबकि कुछ का मानना था कि कबीर एक ब्राह्मण के पुत्र थे जिनको एक बेऔलाद मुसलमान दंपति ने गोद ले लिया , आम राय यह है कि वह एक मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे | दोनों धर्मों के बेहतरीन विचारों के प्रचार के कारण उनके अनुयायियों के बीच उनके अंतिम संस्कार को लेकर बहस हो गई | पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके मृत देह के ऊपर फूल मिले थे और मुसलमानों ने उन्हीं फूलों को दफनाया जबकि हिंदुओं ने उन फूलों का अंतिम संस्कार किया |

गुरुनानक

1469 AD में गुरु नानक का जन्म तलवंडी (वर्तमान में लाहौर, पाकिस्तान) के हिन्दू परिवार के महाजन जाति में मेहता कालू (पिता ) और माता तृप्ता देवी के घर हुआ, गुरु नानक प्रथम सिख गुरु बने और सिख धर्म की नींव रखी | (वर्तमान समय में इनका जन्मदिवस कार्तिक माह की 15वीं पूर्णिमा को मनाया जाता है ) आध्यात्मिक झुकाव, दुनिया और उसके सिद्धांतों के बारे में जागरूकता और दिव्य विषयों के प्रति रुचि के बारे में टिप्पणियाँ उनके जीवन के प्रारम्भिक काल से मिलती हैं जहां प्रतीकों और घटनाओं के बारे में नैतिकता और सार्वभौमिकता की विवेचना की गई है | नानक के पूर्व जीवन के बारे में हमे जानकारी 1475 AD में मिलती है जब वह अपनी बहन (बीबी नानकी) के साथ सुल्तानपुर चले गए जहां बीबी नानकी का विवाह हुआ | 16 वर्ष की उम्र में नानक ने दौलत खान लोदी के शासन में कार्य करना शुरू कर दिया | नानक में दिव्य गुणों की पहचान सबसे पहली बार स्थानीय जमींदार राज बुल्लर और नानक की बहन बीबी नानकी ने की | इसके बाद उन्हें यात्राओं के लिए प्रोत्साहित किया गया और इन्होनें अपने जीवन के 25 साल विभिन्न स्थानों पर उपदेश दिये इस समय के दौरान बने भजनों ने नानक की सोच के अनुसार सामाजिक परेशानियाँ व उनके समाधानों के बारे में बताया | 30 वर्ष की उम्र में उन्हें एक सपना हुआ और वह अपने अनुष्ठान शुद्धि से नहीं लौटे उनके वस्त्र एक तालाब के किनारे तैरते पाये गए, तीन दिन तक गायब रहने के बाद वह फिर से सामने आए और शांत रहे तथा उन्होनें स्पष्ट किया कि उन्हें ईश्वर की सभा में अमृत(जीवन का अमृत) दिया गया और इन्हे ईश्वर के द्वारा उनकी सच्ची शिक्षाओं के प्रचार करने का आदेश दिया गया है |

भविष्य में नानक को गुरु माना गया और उन्होनें सिख धर्म को जन्म दिया | सिख धर्म अपने बुनियादी सिद्धांतों में दयालुता, शांति और मानवीय सिद्धांतों को सिखाता है |

गुरुनानक ने यह पुष्टि कि है कि सभी मनुष्य एक समान हैं और वह गरीबों और दलितों को ज्यादा महत्व देते थे तथा महिलाओं की समानता पर प्रमुखता से बल देते थे | वह महिलाओं को उच्च दर्जा देते थे और उन्हे श्रेष्ठ मानते थे | नानक को मुगल शासक बाबर के अत्याचारों और असभ्यता की निंदा व उसके धर्मतंत्र के बारे में जिरह करने के लिए गिरफ्तार किया गया |

गुरु नानक ने पूरी तरह से प्रचलित पारंपरिक प्रथाओं को उलट दिया और बिना किसी शक के निस्वार्थ सेवा, ईश्वर की प्रशंसा और विश्वास पर बल दिया | इन्होनें वेदों को निरर्थक बताया और हिन्दू धर्म में जाति प्रथा की परंपरा पर प्रश्न उठाए | इन्होनें लोगों को सिखाया कि ईश्वर सब में बसते हैं और उनकी सर्वज्ञता ,निराकार अनंत और बाहरी व सर्व सच की विद्यमान की स्वयं की प्रकृति के बारे में बताया | इन्होनें आध्यात्मिक समानता, भाईचारा ,सामाजिक व राजनीतिक गुणों व अच्छाइयों के मंच की स्थापना की |

नानक ने बताया है कि निस्वार्थ सेवा के द्वारा ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है तथा ईश्वर की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है | इसलिए आदर्श रूप से ईश्वर ही मुख्य कर्ता हैं | इसलिए हमें हमेशा पाखंड व झूठ से बचना चाहिए क्यूंकि ये व्यर्थ के कार्यों को दिखाता है | |सिख धर्म के अनुसार नानक की शिक्षाएं तीन प्रकार से संपादित हैं –वंद चक्को (जरूरतमन्द की मदद करना व साझा करना ), कीरत करो (बिना धोखे के शुद्ध जीवन जीना ), नाम जपना ( खुशहाल जीवन व्यतीत करने के लिए ईश्वर को याद करना )

नानक ने ईश्वर की पूजा करने को व उन्हें प्रत्येक कर्म में याद रखने को महत्व दिया था | उन्होनें अपने मन का अनुसरण करने से बेहतर प्रबद्ध व्यक्ति का अनुसरण करने का सुझाव दिया | इनकी शिक्षाएं गुरु ग्रंथ साहिब(जिसमे 947 काव्य स्त्रोत व प्रार्थनाएँ हैं ) में संग्रहीत हैं और गहन विचारों के छन्द गुरुमुखी में दर्ज़ हैं जिसका ज्ञान आज तक भी अनश्वर है | पुजारियों व काजियों द्वारा गुमराह करने से व परस्पर विरोधी संदेश देने से लोगों की दुर्दशा देखने पर गुरु नानक ने लोगों को आध्यत्मिक सच का मार्गदर्शन करने के लिए पर्यटन शुरू किया | उन्होनें चारों दिशाओं में भाई मर्दाना(उनके सहयोगी ) के साथ हजारों किलोमीटर की पद यात्रा की और सभी धर्मों, जाति व संस्कृति के लोगों से मिले | उनकी यात्राओं को उदासीस कहा गया | जन्मसखी ( जीवन के बारे मे जानकारी व खाते) और वर्स (छन्द) नानक के जीवन के प्रथम जीवन स्त्रोत है जिसे आज तक मान्यता प्राप्त है |गुरदास (गुरु ग्रंथ साहिब की नक्काशी ) | नानक के जीवन के बारे में पहले के जीवन स्त्रोत हैं जन्मसखी और वर्स अर्थात जीवन काल और छन्द| गुरु नानक के जीवन के विधर्म लेख की सही जानकारी देने के लिए भाई मनि सिंह द्वारा ज्ञान रत्नावली लिखी गई थी |

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